फिर अपना क्या, गांव, शहर, देश?
मध्यप्रदेश के गुना के बच्चों को पिता को गोद में ली हुई तस्वीर की कहानी मुझे ओमप्रकाश वाल्मीकि की कविता "ठाकुर का कुआँ" की पंक्तियों तक बार-बार पंहुचा दे रहीं हैं । वाल्मीकि इस कविता में भले जाती व्यवस्था से उपजे उत्पीड़न की बात कर रहे हैं, परन्तु चिंतन के सौवें भाग में, बारम्बार बच्चों के चीख से एक ही सवाल कानो तक आ रही है; "अपना क्या- गांव, शहर, देश?"
ओमप्रकाश वाल्मीकि उत्तरप्रदेश से आने वाले बेहतरीन साहित्यकारों में से एक रहें हैं । दलित साहित्य के विकास में वाल्मीकि की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। "ठाकुर का कुआँ" वाल्मीकि के श्रेस्ठतम रचनाओं की सूचि में शुमार है । वाल्मीकि इस कविता में संसाधनों पे जातिगत एकाधिकार को बताते हुए, हाशिये के लोगों के सवाल पूछते हैं । मामूली लोगों के मूलभूत सवाल ।
ये कविता सन 1981 की है, पर कविता के सवाल मामूली बदलाव के साथ आज भी जीवित हैं । गुना में जेसीबी भले खड़ी फसल पे चलायी गयी हो, परन्तु पुलिस की लाठी से बरसती बर्बरता, भारत के संवैधानिक चेतना को उजाड़ रही थी । वर्दी के ठसक में लाठी बरसाते कानून के ये पहरेदार संविधान के पहली पंक्ति "हम भारत के लोग" में हम को तुम बना रही थी ।
जब रक्षा और कानून की व्यवस्थाएं लोगों के खिलाफ बर्बर होने लगें, तो किसी राम कुमार अहिरवार के बच्चों के पास वाल्मीकि के सवाल के शिवा कुछ नहीं होता । इस कड़ी में एक और बात है, जिसे नजरअंदाज करना, किसी बड़े चूक की तरफ इशारा करता है । इस घटना में उत्पीड़ित और उत्पीड़न-कर्ता (भू माफिया-जिसने धोखे से जमीन को सरकारी बना कर पैसे लिए); दोनों दलित समाज से आते हैं । आम तौर पे हमारी कानून व्यवस्था जातिगत उत्पीड़न के मसलो को जाती व्यवस्था में सिर्फ दलित-स्वर्ण के जातिगत भेद होने के नजर समझती रही है । समझ की ये प्रक्रिया मुलखराज आनंद की उपन्यास "अनटचेबल" के सोहनी और गुलाबो के किरदार से अनजान हैं, जहाँ दलितों के बीच भी अगड़े-पिछड़े की एक वर्ण-व्यवस्था है ।
हम और आप इस बात से इंकार नहीं कर सकते की उत्पीड़न का आधार सिर्फ जाती नहीं है । ऐसा जरूरी नहीं की हर बार उत्पीड़नकर्ता कोई ऊँचे जाती का हो । उत्पीड़न की मानसिक सनक किसी पे सवार हो सकती है, और वो व्यक्ति किसी जाती का हो सकता है । एक दलित भी दूसरे दलित को उत्पीड़ित कर सकता है ।
अपने पिता को गोद में लिए बिलखते बच्चे हमारी न्याय और समतावादी समाज के संवैधानिक परिकल्पनाओं को दर्शाता, हकीकत का आइना है । जमीन और भू माफियाओं के जाल में फंसे ऐसे कई राम कुमार अहिरवार और सावित्री देवी हमारी बुनियादी संवैधानिक व्यवस्थाओं को अपने जख्मो के सवालो से झकझोर रहे हैं । वाल्मीकि की पंक्तियों के तर्ज पे, राम कुमार और सावित्री देवी के बच्चें हमसे पूछ रहे हैं –
फिर अपना क्या, गांव, शहर, देश?
वाल्मीकि की कविता "ठाकुर का कुआँ" के पंक्तियों के साथ आपको छोड़ रहा हूँ, शायद इस कविता के सवाल में आपको कोई जवाब मिल जाये ।
चूल्हा मिट्टी का
मिट्टी तालाब की
तालाब ठाकुर का ।
भूख रोटी की
रोटी बाजरे की
बाजरा खेत का
खेत ठाकुर का ।
बैल ठाकुर का
हल ठाकुर का
हल की मूठ पर हथेली अपनी
फ़सल ठाकुर की ।
कुआँ ठाकुर का
पानी ठाकुर का
खेत-खलिहान ठाकुर के
गली-मुहल्ले ठाकुर के
फिर अपना क्या ?
गाँव ?
शहर ?
देश ?
कविता साभार: कविताकोश

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