टिक-टॉक और दर्शक दीर्घा का नेपोटिस्म
चीनी व्यवसाय में खरोच लगाने के दावों से बैन को ऐतिहासिक बताते-बताते, सैडिस्ट लोगो का एक जमात सोशल मीडिया पे टिक-टॉक स्टार्स के बेरोजगार हो जाने का जश्न मन रहा है । इसी जमात के लोग पिछले कुछ दिनों से बॉलीवुड में नेपोटिस्म पे चीख-चिल्ला रहें थे । मेरे समझ में इस जमात के लोग, वास्तविक समझ से परे सबसे बड़े घोंचू हैं । किसी के रोजगार छीन जाने से खुशी के एहसास में किसी पे व्यंग करना उचित नहीं है ।
टिक-टॉक का प्लेटफार्म पड़ोसी देश का था, परन्तु आप जिसके रोजगार जाने पे खुशी मना रहें हैं, वो शायद आपके पड़ोस में रहता था । आपके जैसे ही मिड्ल क्लास घर में बिना कैमरामैन, और लाइट के संसाधन के अपना फ़ोन ट्राइपौड पे फिक्स करके, अपने दोस्तों या परिजनों के साथ आपको मनोरंजन का एक क्लिप देता था ।
आज के तारीख में मनोरंजन की दुनिया संसाधन संपन्न लोगो के हाथों में सिमट गयी है, परन्तु प्रतिभा साधन संपन्न छत के नीचे ही जन्म ले, ऐसा जरूरी नहीं है । प्रतिभा साधन नहीं साध्य ढूंढती है ।
इस बड़े आबादी वाले देश में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है । हमारे जैसे बड़े आबादी वाले देश में प्रतिभा अवसर नामक बस-अड्डे पे जाता यात्री के सामान है, जो घर से बस पकड़ने निकलती तो जरूर है, पर भाड़ा न होने के अफ़सोस का एहसास पाकर अपना गंतव्य स्थल बदल देती है । जब मौके कम हों और आवेदक ज्यादा, तो व्यवस्थाओं का गैर-लोकतान्त्रिक हो जाना स्वाभाविक है। मनोरंजन की दुनिया भी इसी गैर-लोकतांत्रिक व्यवस्था में पल रहा एक उदहारण है, जिसमे कुल-पक्षपात के बड़े घराने अपने घरों के बहार खड़े प्रतिभा नहीं देखना चाहते ।
जिस दौर में मनोरंजन की दुनिया अपने भीतर के राजतन्त्र पे गुमान में प्रतिभा को ख़ारिज कर रहा था, उसी दौर में टिक-टॉक संसाधन के खायी पाट, इसी मनोरंजन की दुनिया को लोकतान्त्रिक बना, हमारे और आपके घरों के बच्चों को टिक-टॉक स्टार रहा था ।
आप इन बच्चों को जिस नाम से बुलाएँ, वो आपकी मर्जी, पर जिस तरह बिना संसाधन के अपने क्षणिक मनोरंजक प्रतिभा के प्रदर्शन कर नए दौर में अपने प्रसंशक बनाये हैं, उससे उनके अभिनय के प्रति ललक का अनुमान, आप खुद लगा सकते हैं। इनपे अभद्र टिप्पणी करके आप फेसबुक पे खुद को संस्कारी बताने के क्रम में अपने भीतर पल रहे अराजक व्यवस्था को प्रदर्शित कर रहे हैं । कल कोई फेसबुक पे लिखा रहा था- "अब ये नचनिए क्या करेंगे", जाहिर सी बात है, टिक-टॉक नहीं बनाएंगे, पर ऐसा लिख के आप दर्शक दीर्घा में बैठे दर्शक के भीतर पल रहे कुल-पक्षपात को दर्शा रहे थे । आप सब अपनी मरती संवेदनाओं से एक सवाल जरूर कीजियेगा,- "क्या आप सच में नेपोटिस्म के खिलाफ हैं ? और अगर हाँ, तो ड्रीम गर्ल के आयुष्मान और टिक-टॉक के लड़के की लड़की वाले आवाज पे आप कैसे भेद कर लेते हैं ?"
जवाब बड़ा सीधा है, नेपोटिस्म सिर्फ फिल्मकारों और कुछ घरानो तक सिमित नहीं है । नेपोटिस्म दर्शक दीर्घा में बैठे चाहत भरे आँखों के ग्लैमर वाली रोड से गुजरते हुए फिल्मकारों के बड़े घरानो में पहुँचती है । कहानी और अभिनय प्रतिभा को ताख पे रखे, आपके भाई-जान प्रेम के फल से ही, कुल-पक्षपात जैसा बड़ा शब्द अर्थ पता है । हमारे आँखों पे नेपोटिस्म का चश्मा कुछ गिने चुने अभिनेताओं के अभिनय से आगे नहीं देख पाता।
पढ़ने का जोखिम बिना उठाये आप चीन समर्थक का तमगा चिपकाएंगे, तो संतुष्टि के लिए बता दूँ, चीनी व्यवसाय में खरोच लगाने के दावों की सत्यता की पुस्टि, वैश्विक व्यवसाय और नीति निर्माताओं का कार्य क्षेत्र है।
बैन के बाद हर किसी का एक्सपर्ट बन जाना, खुद में एक सत्य है ।

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