"खिड़की से बाहर कूदते पन्ने"
उसके बिस्तर के सामानांतर मेज पे, कुछ किताबें, एक लैपटॉप, सादे पन्नो पे अधूरे लफ्ज़ और जानने वालों के कॉन्टैक्ट नंबर सत्यापित करने की कोशिस पे यदा-कदा चहक उठने वाला फ़ोन, सिरहाने सोतें है ।
क्या वो सच में सोते होंगे, समझने के उलझन में बिस्तर पे लेट, चिंतन की मुद्रा में कई बार सो जाता ।
कभी-कभी अंधेरी रातों में किताबों के खुले पन्ने, पाठक के आस में पेपर-वेट के सहारे सुबह कर देतीं, तो कभी लैपटॉप अपने हुजूर-इ-मालिक के नींद से नाराज, डेढ़ घंटे बाद सोने चला जाता ।
किसी के कॉन्टैक्ट लिस्ट सत्यापित नहीं किये जाने पे, सुबह साढ़े-पांच के दैनिक अलार्म पे शोर मचता फ़ोन, दायीं ओर ऊँगली फेरने पे ऐसे चुप हो जाता है, मानो इसी स्पर्श को रात भर बेताब रहा हो ।
कभी पन्ने पे लिखा अधूरा लफ्ज़ सुबह नए अर्थ पाता, तो कभी अर्थ के अवसाद से ग्रसित होकर पन्ने खिड़की से बाहर कूद जाते ।
मेज़ के सामानांतर बिस्तर पे सोता व्यक्ति, मेज़ पे रखे वस्तुओं को देख उनमे जीवन तलाशता, तो कभी किसी के कांटेक्ट लिस्ट सत्यापित न करने के अवसाद में, खिड़की से नीचे गिरे पन्नो के खोये अर्थ से खुद को जोड़, अवसाद से दूर रहने की सलाह खुद को देता । उम्मीदों के जद से दूर, अपने लिए कुछ पंक्तियाँ लिखता, तो कभी बेफ़िक्र,लोगों में बाँट देता।

सुंदर
जवाब देंहटाएंबेहतरीन ❤️
जवाब देंहटाएंBahut badhiya
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