"लिंचिंग एवं भारतीय अफवाह सभ्यता"
महाराष्ट्र कोरोना से सर्वाधिक प्रवाभित राज्यों में से एक है, और वहां से हर रोज कुछ जिंदगी हारने की खबर आ रही है । इन खबरों के बीच एक खबर महाराष्ट्र के पालघर जिले से आता है, जहाँ कुछ उन्मादियों के जमात ने तीन लोग को चोरी की आशंका से ग्रसित होकर मार-मार कर अधमरा कर देता है, और अस्पताल ले जाने के क्रम में उनकी मृत्यु हो जाती है । "द हिन्दू" अख़बार ने अपने रिपोर्ट में बताया है की सोशल मीडिया पे लॉक-डाउन में चोरी और डकैती के आशंका के सन्दर्भ में खासा अफवाह फैला हुआ था, जिसके कारन गांव के लोग रोड पे विगत कुछ दिनों से पहरा दे रहे थे । इन्ही पहरेदारों की नज़र इन लोगो के गाड़ी पे पड़ती है, और फिर ये पहरेदार इस घटना को अंजाम तक पंहुचा देते हैं ।
अब इस घटना जो आपको जिस रंग और परिपेक्ष में समझना हैं समझें, परन्तु मेरी राय में इस घटना के तीन मुख्य आरोपी हैं, एक वो जिन्होंने इस घटना को प्रत्यक्ष रूप से अंजाम तक पहुंचाया, दूसरे वो जिन्होंने ऐसी अफवाहें को फैला कर ऐसी घटना को तूल दे रहें थे, और तीसरा वहाँ की कानून व्यवस्था, जो ऐसी अफवाह के नजर में आने के वावजूद गांव वालों को सुरक्षा मुहैया करने, और सुरक्षित होने का भरोसा दिलाने में चूक गयी, जिसके फलस्वरूप एक उन्मादी पहरेदारों की भीड़ जमा होती हैं, और तीन लोगो की जान ले लेती हैं ।
अगर हम विगत कुछ सालो में घटित लिंचिंग की घटनाओं पे ध्यान दें, तो सोशल मीडिया के अफवाह एक अवियोज्य कारक के तौर पे नजर आता हैं, जो लोगों में सनक की हवा को बढ़ावा दे, ऐसी घटनाओं को अंजाम तक पहुँचता हैं । लिंचिंग भारतीय सभ्यता में सोशल मीडिया पे फैले फेक न्यूज़ का एक अपरिहार्य प्रतिफल हैं, जिसके जनक चंद समाजिक और राजनैतिक संगठनों के आईटी सेल हैं ।
इस फेक न्यूज़ का प्रयोग राजनैतिक एजेंडा को सींचने की लालसा से प्रभवित होता है, जिसे हमारे और आपके जैसे सामन्य लोग सच समझ कर मानसिक उपभोग कर बैठते है ।
हमारे शिकार होने की प्रक्रिया में हमें कुछ डॉक्टर्ड तस्वीर या वीडियो दिखया जाता है, जिसे हम सच मान बैठते है । ऐसी तस्वीरों को सच मान लेना भारतीय सभयता का एक अति साधारण मानवीय प्रविर्ती हैं, क्यूंकि हम सालो से इन्ही तस्वीरो पे भरोसा करते आये हैं, और एक साधारण मनुष्य की परिकल्पनाओं में तस्वीरें झूठ नहीं बोलतीं ।
हमारी ये सोच दूरभाष में साइंस एवं टेक्नोलॉजी के आक्रमण से अनजान हैं, जिसमे झूठ को चंद डॉक्टरड तस्वीरों का हवाला दे सच की भांति पेश करने और उसे हमारे समाज के मनोस्थिति में स्थापित करने की ताकत हैं ।
हम और आप ऐसी घटनाओं को चाहे जिस रंग में देखे और किसी शक्ल में पेश करें, परन्तु सच यही हैं की झूठ अब सच हैं ! इस झूठ के दम पे एक ऐसी भीड़ बन गयी हैं, जो किसी के जान ले सकती है । फेसबुक पे आईटी सेल से प्रेरित हो अब आम फेसबूकिया पहलवान भी इसमें सांप्रदायिक रंग के मौजूद होने की चेष्टा व्यक्त कर रहें हैं ।
पर हमारी मानिये तो प्लीज मौत और लिंचिंग की तस्वीरों को मौत और लिंचिंग के नजर से देखिये, क्यूंकी इसमें कोई रंग मिला दिया जाये, खून का रंग लाल ही रहेगा, और आरोपियों के हाथ उसी खून में साणे हैं, जिसके शिकार आम जान मानस बनती रही है ।
ऐसी घंटनाओं के आंशिक अपराधी शायद हमारे और आपके घरों में भी मिलेंगे, जो ऐसी तस्वीरों को साझा कर, ऐसी घटनाओं को अप्रत्यक्ष तौर पे अंजाम तक पहुंचने में मददगार बनते हैं । सोशल मीडिया के महाबलियों से अनुरोध हैं की, सस्ती लोकप्रियता के ललक में सांप्रदायिक कुतर्क के सिद्धांत पे आधारित कुछ भी न लिखें, जिसमे भारतीय संविधान के बहुदावादी छवि को बर्बाद करने की सनक हो ।
इस बात का ध्यान हमेसा रखें की जिस सनक को आप अपने स्मार्टफोन के सहारे बढ़ा रहें है, वो किसी की हितैषी नहीं है ।आपके सांप्रदायिक कुतर्क के सहारे पल रहे इस अफवाह की सभ्यता, एक दिन आपके खिलाफ भी खड़ी हो सकती है, और उस वक़्त भी इसमें मासूम जान लेने की ताक़त रहेगी, और ये आपके पारिवारिक अर्थशास्त्र के पकरिकल्पनाओं को नस्ट कर देगी, जिसमे आप कोई अफसर, इंजीनियर या डॉक्टर बन अपने परिवार के काम आ सकते थे ।
Image Courtesy: OneIndia

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