पैसेंजर ट्रेन: प्रथम संस्करण
यात्री 1- अरे, तनी बगल होइए, गेटबे पे खड़ा हो जाते हैं ।
यात्री 2- अंदर एतना भीड़ है, बुझाता नहीं है का ?
यात्री 1- इतना भीड़ से प्रॉगलम है, त काहे नहीं चार-चकवा खरीद लेते हैं।
यात्री 2- अरे, अपन काम करिये न महाराज, झूठो लेक्चर मत दीजिये, का करेंगे का नहीं उ तोरा से पूछ के करेंगे ।
यात्रीगण- अरे काहे मार कर रहे हैं, तनी बेलाग हट जाइये, उ अंदर आ जायेंगे ता खड़ा हो जाइएगा, आउ जेतना मन हो, पटना तक हावा खाते रहिएगा ।
यात्री 2- जाइये, जा के टेकरी नरेश के गद्दी पे बैठ जाइये, ऊहे बिना न शोभ रहें हैं ।
यात्री 1- बैठबे करेंगे, तोरा कोनो प्रॉग्लैम है?
यात्रीगण- अजी जब उ जगह दे दिए, ता काहे मुहा-ठेठी कर रहे हैं, आ के ओंट पकड़ के खड़ा हो जाइये ।
यात्री 3- अपन देह के भार, हमरा पे मत लादिए, ऐसे ही माथा ख़राब है, ऊपर से आप भी.....***.
यात्री 1- इतना दिक्कत है, ता काहे ला ट्रैन से चलते हैं ? जेकरा देखो ओहे ऐंठ रहा है । जैसे सब टेकरी नरेश के बुतरू आजहे निकला है।
यात्रीगण- अरे ऊपर सहरा के लिए पकड़ लीजिये सर, काहे नया लइकन से मुँह लगते हैं, आज के लइकन केकरो सुनता है ।
यात्री 1- हाँ, लेकिन हाथ ऊपर करले-करले मन उबिया जाता है, ता ओटग जाते हैं ।
पत्ता खेलते हुए यात्रीगण- अरे मरदे गुलाम आपके पास था । हमहू सर के लड़ाई छोडाबे में ध्यान नहीं दिए । अच्छा फिर से बांटो ।
पत्ता खेलते हुए दूसरा यात्री- मर्दे ईगो पतवा कम काहे दिए जी, करबा सरकार जइसन ।
पत्ता बाँटते हुए यात्री- अबकी लालू जी के लइका के ही वोट देंगे, ई कुछो किया जी ।
यात्री 1- हाँ, फिर से जंगल-राज ले आइयहू, आउ का ।
यात्री 3- ता नितीश जी तो जैसे घरे-घरे पइसा पहुचा देलथि हे । तानी बेलाग हो जाइये चचा, बड़ी गर्मी है ।
यात्री 2- (गेट के पास से) आत्मनिर्भर बनिए चचा, केतना दिन ओटग के काम चलाइयेगा ।
यात्री 2- अब उमर न हइ हो, तोरा नियत हली ता बिना ट्रैन के आठ कोस चल जा हली । इ लो न हमरा परसा उतरना है, बैगवा धरा देना उतरे घड़ी ।
यात्री 1- लाईये दीजिये, पहिले ही बोलते, काहे ला दू स्टेशन ला अंदर गए थे, एहिजे खड़ा रहते । 🙂
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें