लाखों कहानी का एक नायक : इरफ़ान

इंसानी तौर पे हर शख्स दूसरों के यादों के कैनवास पे जीता है, और उसी पे मर जाता है । क्यूंकि स्मरण के क्षणो की जमापूंजी उसके साथ नहीं जाती । वो यहीं रहती है, अनगिनत आँखों में पेंशन फण्ड के तरह, जिसे कोई जरूरतमंद करीबी, अपने नास्टैल्जिया के पलों में डेबिट करता है । आखिरी आरामगाह तक के सफर को यादों के रंगीन फ्लैशबैक में, एक जिन्दा सपने के तरह देख, जिंदगी के ब्लैक-एंड-वाइट सच से खुद को रूबरू कराता है । संभावनाओं के पंक्तियों पे पूर्ण-विराम लगा, कोई यादों की अलमारी ऐसे बंद करता है, जैसे फेसबुक पे अकाउंट डीएक्टिवेट कर रहा हो, पर जिंदगी उसे "मै वापस आऊंगा" के जिंदादिली के विकल्प से बेहतर कुछ नहीं देता ।  

ऐसे ही "मै वापस आऊंगा" इरफ़ान के जिंदादिली में बोध होता है, जब वो अपने आखिरी फिल्म के प्रमोशन के आखिर में "वेट फॉर मी"  बोलते हैं ।
इंसानी तौर पे अब ये इंतज़ार प्रतिभा और हुनर के उस अनंत सुण्य की तरफ इशारा कर रहा है, जिसे वो पीछे छोड़ गएँ हैं ।
ये अनंत सुण्य हर उस कहानी को दर्शाता है, जिसे एक इंसान अपने पीछे छोड़ जाता है। जिंदगी का गिरता पर्दा, उस इंसान से जुड़े संभावनाओं पे पूर्ण-विराम के तरह होता है, जिससे वो अपने लोगों में जिन्दा होता है । जिससे वो खुद में जिन्दा होता है ।
इरफ़ान की कहानी माध्यम वर्गीय समाज की आम जिंदगी की संभावनाओं की कहानी है, जिससे हर कोई खुद को जोड़ लेता है। 
मशहूर होने का सपना देखते-देखते, क्रिकेटर बनने की संभावनाओं में खुद को तलाशते, साधनो के आभाव में कब एक शख्स, अदा के राष्ट्रीय विद्यालय के तरफ अपना अटैची उठा शख्शियत बनने निकल पड़ता है, किसी को पत्ता भी नहीं चलता ।
वो शख्स सलाम बॉम्बे से बम्बई को "जैपुरिया सलाम" पेश कर, डब्बा वालों के चूक पर साजन फर्नांडिस बनके सिल्वर स्क्रीन पर अपने संतुलित प्यार से खुद को अलग कर, बॉलीवुड में पान सिंह तोमर की गरीबी ले हतप्रभ दौड़ने लगता है । उसके स्थिर अभिनय का कारवां हॉलीवुड के हाईवे के तेज़ रफ़्तार से गुजरते हुए नए मुकाम को छूता है ।
आप इस कहानी से खुद को जैसे भी जोड़ कर देखें, आपको इरफ़ान की कहानी में एक अदृश्य सकारात्मकता का भाव नजर आएगा । उस शख्स ने क्रिकेटर न बन पाने के मलाल को, मशहूर होने के सपने पे कभी हावी नहीं होने दिया । वो शख्स खुद को नए संभावनाओं के कैनवास पे ऐसे उतारा, जो उनके जाने के बाद भी लोगों के जेहन से नहीं उतर रहा । 

इरफान की कहानी उन लाखों सपनों की कहानी है, जो खुद को किसी नए कैनवास पे तलाश रहें हैं । उनकी कहानी सपने और हकीकत के बीच के चुनाव के समझौते की सहमति की कहानी है । आम लोगों के सपनो और हकीकत के बीच घटते घटनाओं की कहानी, जिससे हर शख्स खुद को जोड़ लेता है ।  सकारात्मकता और जिंदादिली से कैसे कोई शख्स अपने जिंदगी के कैनवास को बड़ा कर, अपने लिए नए संभावनाएं तलाश, खुद को स्मरण में स्थापित कर देता है, किसी को पता भी नहीं चलता ।
हम और आप भी इन्ही संभावनाओं के तलाश में शायद हर रोज किसी ऐसे ही सफर पे न जाने कितने समझौतों कर, उस सपने से खुद को जोड़ लेते हैं, जिसे कल ही कोई जी के गया है । हमारे चयन के स्तर शायद अलग हों, पर हम सब जद्दोजेहद के उसी स्तर से गुजरते हैं । 

इन्ही संभावनाओं के समझौते से तो हमारी जिंदगी का कैनवास हर दिन बड़ा होता जाता है, और हम अपने स्मरण के जमापूंजी में कुछ नए पल जोड़, दूसरों के नास्टैल्जिया के क्षणो के लिए कुछ यादें छोड़ जातें हैं ।

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