काल्पनिक ग्रामीण संघर्ष के चश्मे से नये अराजक की खोज !
दिल्ली का मुख़र्जी नगर हो या पटना का महेन्द्रू, प्रयागराज का कटरा हो या जयपुर का लाल-कोठी , सबकी कहानियां एक सी हैं ।
जब देश के लोग दिवाली/होली पे घर जाने की खुशी से झूम रहे होतें हैं, तब वहां 10*8 के कमरे में बैठा एक छात्र इस गुना गणित में डूबा होता - इस बार क्या कहूंगा ? कितने दिन और चाहिए मुझे ? मैं क्यों सफल नहीं हो रहा हूँ ? मुझसे हो पायेगा भी या नहीं ?
असल में ऐसे सवालों के जवाब शायद किसी के पास नहीं, छात्रों के पास तो बिलकुल नहीं । भारतीय रेल पे घर जाता अभ्यार्थी अपने सपने और हकीकत के टाइम-मशीन में फंसा वो आशावादी व्यक्ति है, जिसे अपने लेट होने में आशा की किरण नजर आती है - शायद टाइम लगेगा ।
इस आशावाद के अलावा उसके पास है ही क्या ? व्यवस्थाओं ने इसके अलावा उन्हें कोई विकल्प भी तो नहीं दिया ।
टीवी स्टूडियो और बड़े आफिसों में बैठ कुछ लोग इन्हे अराजक कह रहें हैं । कल शायद कोई इन्हें आतंकवादी कह दे, पर क्या ये छात्र सच में अराजक और आतंकवादी हैं ?
अगर हाँ, तो एक बात आप मान लीजिये, भूखे पेट जब कोई शख्स अपने हक़ ले लिए खड़ा होता है, तो सत्ता के नजर से वो शख्स अराजक नजर आता है, और नौकरी की बात करता हर शख्स कम्युनिस्ट दिखाई पड़ता है ।
परन्तु असल में वह सिर्फ अपने पेट की भूख और परिवार को गरीबी से बहार निकालने का प्रयत्न कर रहा होता है । विचार और विचारधारा का नायक बनने के सपने से कोसों दूर वह बस एक कमाता-खाता आदमी बनना चाहता है ।
जिस देश के बच्चे "भारतीय ग्रामीण जीवन और उसके संघर्ष" पे निबंध लिख कर आज बड़े ओहदे तक पहुंच गए, आज वैसे बड़े लोगों को उस संघर्ष में अराजकता नजर आ रही है । शायद उनके ग्रामीण जीवन के संघर्ष की समझ सिर्फ निबंध तक ही सीमित रह गयी है ।
वो इस बात से अनजान हैं, कि उनके घर से ऑफिस के रस्ते में जो भीड़-भाड़ और कोचिंग वाला मोहल्ला नजर आता है, वहां न जाने कितने गांव के सपने जलते हैं । जहाँ कोई उस ग्रामीण जीवन के संघर्ष की आधी कहानी जी रहा होता है, जिसका दूसरा हिस्सा ग्रामीण बैंक के खाते में अगले महीने के किरये और राशन के जुगाड़ में कोई धान और मसूरी उगाता है । इस उम्मीद में की बेटा/बेटी को ग्रामीण जीवन का संघर्ष न झेलना पड़े ।
👌
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