तुम कहाँ से हो?
6 नवंबर 2018, मेरे नए इंटर्नशिप के ऑफिस का पहला दिन । आम तौर पे इंटर्नशिप के पहले दिन हम सिर्फ अपने टीम, रिसेप्शन पे बैठी शख्स, और दिन भर भागमभाग मचाने वाले अपने टीम के सपोर्ट-स्टाफ से ही मिलते हैं, पर ये आम दिन नहीं नहीं था ।
ऑफिस में प्री-दिवाली सेलिब्रेशन थी और सारे लोग उसी के तैयारी में जुटे थे । शाम होते पूरा ऑफिस कांफ्रेंस हॉल और रिसेप्शन एरिया के तरफ जमा होने लगा था । आम तौर पे ब्लैक एंड वाइट दिखने वाला ऑफिस आज, लाल, पीला, गुलाबी दिख रहा था ।
कोर्ट दिवाली की छुट्टी पे थी । इन सब के बीच काला सूट पहने मैं अपने कंप्यूटर पे किसी राजमार्ग का कॉन्ट्रैक्ट पढ़ रहा था ।
कोर्ट के छुट्टी वाले दिन अगर कोई शख्स सूट में ऑफिस आये, तो बाकि स्टॉफ यह समझ जाते की कोई नया इंटर्न है । इसी बीच मेरे सीनियर का आवाज़ आता है, "यार इधर आ जाओ, कल कर लेना" ।
लोगों से परिचय का सिलसिला शुरू होता है, कोई अपना नाम बताता, कोई नाम के साथ अपना कॉलेज, तो कोई ओहदा ।
मैं हर बार अपने नाम और कॉलेज के साथ अपना शहर बताता ।
दीवली के छुट्टियों के बाद ऑफिस वापस ब्लैक एंड वाइट दिखने लगा था । कोर्ट जाना दिनचर्या का हिस्सा बन चुका था । कभी दिल्ली उच्च-न्यायलय तो कभी किसी क्लाइंट के लिए फरीदाबाद सिविल कोर्ट, तो कभी साकेत । कभी किसी सीनियर के साथ तो कभी अकेले ।
ऐसे ही एक दिन वेट-ऑवर (दो केस के बीच का वक़्त) में सीनियर के साथ लंच करते हुए घर पे बात निकल आयी । उन्होंने पूछा, तुम बिहार में पटना से हो? यार मेरे कुछ दोस्त हैं पटना से ।
मैंने कहा, नहीं जहानाबाद ।
आम तौर पे देश के बिभिन्न शहरों से दिल्ली आये लोगों की जानकारी दिल्ली और अपने शहर तक सीमित होती है । हर शख्स दूसरे शहर और वहां के लोगों की कल्पना अपने किसी कॉलेज के दिनों के दोस्त के बताये कहानी के हिसाब से करता, और शहरों को समझने का शायद यही प्रचलित कॉर्पोरेट तरीका भी हैं ।
मैंने उनसे पूछा: मैम आप कहाँ से हैं ?
यार मेरी फॅमिली भुवनेश्वर में रहती है, पर हमलोग एक दूसरे डिस्ट्रिक्ट के रहने वाले हैं । शुरू से भुवनेश्वर रही पर अब दिल्ली ही रहती हूँ । वहां कम आना जाना होता है, घर वाले यहीं आ जाते हैं । वैसे तुम बताओ, तुम यहाँ से घर जाओगे या कॉलेज ? और जहानाबाद कैसा शहर है ?
कुछ देर तक मैं सच में सोचने लगा की कैसा शहर है जहानाबाद? वहां रहते हुए कभी किसी ने इस विषय पे नहीं पूछा । अचानक आये इस सवाल ने मुझे चितन के द्वन्द में फंसा दिया था, जहाँ मैं सोंच रहा था क्या बताऊँ ?
इतिहास, भूगोल, नामचीन हस्तियां, या नक्सलवाद ।
काफी कुछ था बताने को पर उस वक़्त सहसा मैंने कहा, "मैम बस इतना कह सकता हूँ कि एक जगह है जहाँ से मैं हर जगह जाता हूँ । कुछ पाने के बाद वहीं लौटता हूँ, जहाँ खोकर लौटने में डर नहीं लगता । एक जगह है, जहाँ हर बार लौटकर मैं हम में तब्दील हो जाता हूँ ।"
एक शहर को आधे घंटे के लंच पे बता पाना मेरे बस की बात नहीं थी । खासकर तब जब वो मेरे एकमात्र आशियाना की हो । मेरे लिए मेरा शहर सिर्फ इतिहास या भूगोल नहीं, बल्कि मेरे लोगों की जिन्दा कहानी है, जिसमे मेरे जैसे हज़ारों बच्चे बड़े हुए और बड़े शहरों में बस गए । वो माँ-बाप जो आज भी घर छोड़कर बड़े शहर नहीं गए, जिनके प्राण निकल गए अपने बनाये आशियाने की रखवाली में । वो लड़की जिसे प्रेम-विवाह के डर से दूसरे शहर जाकर पढ़ने की अनुमती नहीं मिली, वो प्रेमी जोड़ा जो सरकारी नौकरी के भेंट चढ़ गया । वो किसान किरायेदार जिसने बच्चों के स्कूल फीस के लिए फसल सस्ती बेच दी, या वो एकमात्र सुपुत्र जो मोटरसाइकिल न खरीदने पे अपने भागने की धमकी माँ को सुनाता है ।
सब बताना था, पर वेट-ऑवर खत्म होने को था । कोर्ट नंबर 50 का लिस्ट A-34 आ चुका था ।
जहानाबाद सीरीज: प्रथम संस्करण । इस सीरीज में किस्से के माध्यम से जहानाबाद शहर से रूबरू कराऊंगा ।
सप्रेम धन्यवाद
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