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दुनियावी इतिहास का अहिंसक बादशाह - महात्मा गाँधी

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बिहार के कस्बों और शहरों में निकाय चुनाव के मुनादी के उपरांत वार्ड-प्रखंड की संकीर्ण गलियों एवं बेतरतीब से बसे मोहल्लों में उम्मीदवारों और भावी सदस्यों का प्रचार जोर पकड़ चुका है । चौक चौराहे पे चाय और चौमिन पे जारी चर्चा के बीच उम्मीदवार का जीत और हार का अनुमान इस बात से लगाया जा रहा कि "फलाने उम्मीदवार का प्रचार कितने स्कार्पियो से हो रहा", "फलाने चचा चुनाव में इतना पैसा खर्च कर रहे" आदि इत्यादि । आम तौर पे देश में महंगी हो चुकी चुनावी राजनीती का असर अब निकाय चुनावों पे भी दिखने लगा है ।  पिछले डेढ़ दशक में गाँधी के इस ग्राम-स्वराज की कल्पनाओं में लोगों ने कितनी भागीदारी सुनिश्चित की गयी इस बात की पुष्टि करना शायद मुश्किल हो, परन्तु महिंद्रा स्कार्पियो ने इन चुनावों में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करने कोई मौका हाथ से जाने नहीं दिया । भावी वार्ड पार्षद के कदम से कदम मिलकर चलता महिंद्रा स्कार्पियो न जाने कितने तंग गली-मोहल्लों से गुजरता हुआ साफ़ सड़क का वादा कर, उम्मीदवार के राजनीतिक सफर को गती प्रदान करता है ।  राजनीती में यात्रायों का अपना एक अहम् स्थान है । हम यात्रा कर...

तुम कहाँ से हो?

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6 नवंबर 2018, मेरे नए इंटर्नशिप के ऑफिस का पहला दिन । आम तौर पे इंटर्नशिप के पहले दिन हम सिर्फ अपने टीम, रिसेप्शन पे बैठी शख्स, और दिन भर भागमभाग मचाने वाले अपने टीम के सपोर्ट-स्टाफ से ही मिलते हैं, पर ये आम दिन नहीं नहीं था । ऑफिस में प्री-दिवाली सेलिब्रेशन थी और सारे लोग उसी के तैयारी में जुटे थे । शाम होते पूरा ऑफिस कांफ्रेंस हॉल और रिसेप्शन एरिया के तरफ जमा होने लगा था । आम तौर पे ब्लैक एंड वाइट दिखने वाला ऑफिस आज, लाल, पीला, गुलाबी दिख रहा था । कोर्ट दिवाली की छुट्टी पे थी । इन सब के बीच काला सूट पहने मैं अपने कंप्यूटर पे किसी राजमार्ग का कॉन्ट्रैक्ट पढ़ रहा था । कोर्ट के छुट्टी वाले दिन अगर कोई शख्स सूट में ऑफिस आये, तो बाकि स्टॉफ यह समझ जाते की कोई नया इंटर्न है । इसी बीच मेरे सीनियर का आवाज़ आता है, "यार इधर आ जाओ, कल कर लेना" । लोगों से परिचय का सिलसिला शुरू होता है, कोई अपना नाम बताता, कोई नाम के साथ अपना कॉलेज, तो कोई ओहदा । मैं हर बार अपने नाम और कॉलेज के साथ अपना शहर बताता । दीवली के छुट्टियों के बाद ऑफिस वापस ब्लैक एंड वाइट दिखने लगा था । कोर्ट जाना दि...

काल्पनिक ग्रामीण संघर्ष के चश्मे से नये अराजक की खोज !

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दिल्ली का मुख़र्जी नगर हो या पटना का महेन्द्रू, प्रयागराज का कटरा हो या जयपुर का लाल-कोठी , सबकी कहानियां एक सी हैं । जब देश के लोग दिवाली/होली पे घर जाने की खुशी से झूम रहे होतें हैं, तब वहां 10*8 के कमरे में बैठा एक छात्र इस गुना गणित में डूबा होता - इस बार क्या कहूंगा ? कितने दिन और चाहिए मुझे ? मैं क्यों सफल नहीं हो रहा हूँ ? मुझसे हो पायेगा भी या नहीं ? असल में ऐसे सवालों के जवाब शायद किसी के पास नहीं, छात्रों के पास तो बिलकुल नहीं । भारतीय रेल पे घर जाता अभ्यार्थी अपने सपने और हकीकत के टाइम-मशीन में फंसा वो आशावादी व्यक्ति है, जिसे अपने लेट होने में आशा की किरण नजर आती है - शायद टाइम लगेगा । इस आशावाद के अलावा उसके पास है ही क्या ? व्यवस्थाओं ने इसके अलावा उन्हें कोई विकल्प भी तो नहीं दिया । टीवी स्टूडियो और बड़े आफिसों में बैठ कुछ लोग इन्हे अराजक कह रहें हैं । कल शायद कोई इन्हें आतंकवादी कह दे, पर क्या ये छात्र सच में अराजक और आतंकवादी हैं ? अगर हाँ, तो एक बात आप मान लीजिये, भूखे पेट जब कोई शख्स अपने हक़ ले लिए खड़ा होता है, तो सत्ता के नजर से वो शख्स अराजक नजर आता है, औ...

उत्तर प्रदेश के ब्राह्मणो के नाम एक पत्र :-

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ये उत्तर प्रदेश के कौन से ब्राह्मण मतदाता हैं, जो इंसान नहीं है, सिर्फ मतदाता हैं । खीरी इलाके के वो कौन से ब्राह्मण हैं, जिन्हें पूरे समाज में सिर्फ एक हत्यारोपी में नेता दिख रहा है । ऐसे समाज को मैं नहीं जानता । जिन्हें मैं नहीं जानता उन्हीं के नाम पे पत्र लिख रहा हूँ । डिअर उत्तर प्रदेश के ब्राह्मणों, लखीमपुर में किसानों पे चढ़ती जीप और फार्चूनर ने आठ घरों में अफ़सोस और संताप के सिवा कुछ नहीं छोड़ा । उनके परिजन/बच्चे घर नहीं लौटे, जो दंगल और प्रदर्शन के बाद लौट आने का वादा कर घर से निकले थे । सरकार और राजनीती अपने हिसाब से जिंदगी को आंकड़े और मुआवज़े को सांत्वना के तौर पे पेश कर खुद को राजनीती के मापदंड और मास्टरस्ट्रोक के द्वन्द में उलझा कर व्यस्त दिखाने लगी है । पुलिसीआ जाँच के नाम पे कुछ लोगों को गिरफ्तार किया गया । एक नामजद अभियुक्त की गिरफ़्तारी हेतु आपके (ब्राह्मण) पहचान और वोट के मद्देनजर विशेषाधिकार भी मुहैया कराया गया, ताकि आपके भीतर का ब्राह्मण और मंत्री की कुर्सी आहात न हो । इन सब के उपरांत सरकार आश्वस्त है "ब्राह्मणो के नेता एवं हत्यारोपी को विशेषाधिकार देकर उ...

हथरस

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हॉस्पिटल के बेड से लिखे स्वर्गीय रघुवंश बाबू की चिट्ठी का विवरण देती मीडिया से हथरस की पीड़िता का अंतिम बयान मत पूछिए, देश में दीपिका और ड्रग्स जैसे गंभीर मुद्दे हैं । वैसे जान कर क्या कर लेंगे, फेसबुक पे कैंपेन या व्हाट्सप्प पे फॉरवर्ड ? मेरी  मानिये इससे कुछ नहीं होता, जिस हल्केपन से आप रीट्वीट और शेयर करते हैं, उसी हल्केपन आप समझे भी जाते हैं । तभी तो बाईस सितम्बर तक इस मामले की जांच में रेप जैसे संगीन अपराध की जांच करना भी पुलिस उचित नहीं समझ रही थी । इंसाफ और जिंदगी की जंग लड़ती पीड़िता, जिंदगी की जंग तो हार गयी । आधी रात को बिना परिजनों के पीड़िता का अंतिम संस्कार भी कर दिया गया । समाज इन तस्वीरों तो देख कर आग-बबूला हो रहा है । "गाड़ी पलटवा दो सरकार" और "हैदराबाद का एनकाउंटर न्याय" लोगो के नारों में जगह बना रहा है । देश में कानून के नदारथ होने की गवाही देती जनता रीट्वीट कर रही है । बलात्कार और हत्या जैसे संगीन घटना के बाद समाज को कानून में कमी दिखा कर अपराधियों को सुरक्षा देती राजनीती अपने समाज में आम हो चली है । हर बड़ी घटना के बाद लोगों का कानून से विश...

Dil-Bechara❤️

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#DilBechara आप अपने घर के रिवाजों से खिलाफत कर सकते है ? अगर नहीं कर सकते तो, दिल बेचारा जरूर देखें । फिल्म का शुरुआती बैकग्राउंड डायलॉग - "एक था राजा एक थी रानी, मेरी नानी हमेसा बचपन में ये कहानी सुनती थी- पर ऐसी कहानियां किसी को अच्छी नहीं लगतीं, हमे तो प्यार, पागलपन और वो रोमांटिक बकवास पसंद है, जो बॉलीवुड बनाता है"। ये फिल्म बॉलीवुड के बैनर तले बनी है। प्यार को तय मानकों और सलीके से कहानी को आस पास के किरदारों से सजा कर एक निश्चित अंत तक पहुँचाना, इस घर का रिवाज । अनिश्चित कहानी में निश्चित बस एक है, अंत और उसका होना । चाहे वो प्रेम हो या जिंदगी, सबका अंत निश्चित है । अंत अभिमन्यु के "तुम न हुए मेरे तो क्या, मैं तुम्हारा, मैं तुम्हारा...." जैसा है, अधूरा, क्यूंकि जिंदगी ही अधूरी है । अभिमन्यु के अधूरे गाने के पूरा होने का इंतज़ार करती कीजी, मैनी से मिलकर पूरा होने के एहसास में खुद सिहरने लगती है । उसे पता था, उसे जाना है, फिर भी इस अंत के एहसास को सेरी बोल, दोनों एक दूसरे में शरीक हो जाते हैं । कीजी मन ही मन समझती थी ये समबन्ध बराबरी का नहीं है, उसे ए...

कृषक समाज का नया अम्बैस्डर: भाई सलमान

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गरीबी हटाओ से गरीब हटाओ के रेसेंटमेंट के बीच, 2014 में गरीबों को ब्रांड-अम्बैस्डर मिला । किसानो के समस्या के समाधान हेतु, अब भाई आगे आये हैं । इस ब्रांडिंग के बाद भी अगर देश के किसान आत्महत्या करें, तो इससे ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण कुछ नहीं हो सकता । फसल बर्बाद होने और सही दाम नहीं मिल पाने पे, जंतर मंतर या चक्का-जाम करके धरना प्रदर्शन करने का रिवाज़ जल्दी ही समाप्त हो जायेगा । अरे, भाई आप अपने किसमत और मेहनत की जिम्मेवारी कब तक सरकार पे थोपते रहेंगे ।  देखिये सलीम जी के बड़े लड़के को, इसी किसानी से हज़ारो कड़ोड़ कमा लिया, और आप सरकार पे ही अपना ठीकरा फोड़ रहे हैं, जैसे नौकरी न मिलने पे बेरोजगार युवा नौकरी न होने का बहाना बना रहा हो । समय रहते मेहनत करते तो आप भी सक्सेसफुल हो सकते थे, पर नहीं आपको बस एंटी होना है । खैर, सक्सेसफुल किसान होने के विषय पे जल्दी ही वेबिनार शुरू हो जायेगा। मुख्य-वक्ता एवं सफल किसान श्री सलमान भाई के श्रीमुख से सफल किसान होने के सौ मंत्र आपके रंगीन स्मार्टफोन के स्क्रीन पे प्रसारित होने लगेंगे । इसको देख के आगे से खेती-बाड़ी कीजिये, तब न टाइम्स नाउ और ज़ू...