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जुलाई, 2020 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

Dil-Bechara❤️

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#DilBechara आप अपने घर के रिवाजों से खिलाफत कर सकते है ? अगर नहीं कर सकते तो, दिल बेचारा जरूर देखें । फिल्म का शुरुआती बैकग्राउंड डायलॉग - "एक था राजा एक थी रानी, मेरी नानी हमेसा बचपन में ये कहानी सुनती थी- पर ऐसी कहानियां किसी को अच्छी नहीं लगतीं, हमे तो प्यार, पागलपन और वो रोमांटिक बकवास पसंद है, जो बॉलीवुड बनाता है"। ये फिल्म बॉलीवुड के बैनर तले बनी है। प्यार को तय मानकों और सलीके से कहानी को आस पास के किरदारों से सजा कर एक निश्चित अंत तक पहुँचाना, इस घर का रिवाज । अनिश्चित कहानी में निश्चित बस एक है, अंत और उसका होना । चाहे वो प्रेम हो या जिंदगी, सबका अंत निश्चित है । अंत अभिमन्यु के "तुम न हुए मेरे तो क्या, मैं तुम्हारा, मैं तुम्हारा...." जैसा है, अधूरा, क्यूंकि जिंदगी ही अधूरी है । अभिमन्यु के अधूरे गाने के पूरा होने का इंतज़ार करती कीजी, मैनी से मिलकर पूरा होने के एहसास में खुद सिहरने लगती है । उसे पता था, उसे जाना है, फिर भी इस अंत के एहसास को सेरी बोल, दोनों एक दूसरे में शरीक हो जाते हैं । कीजी मन ही मन समझती थी ये समबन्ध बराबरी का नहीं है, उसे ए...

कृषक समाज का नया अम्बैस्डर: भाई सलमान

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गरीबी हटाओ से गरीब हटाओ के रेसेंटमेंट के बीच, 2014 में गरीबों को ब्रांड-अम्बैस्डर मिला । किसानो के समस्या के समाधान हेतु, अब भाई आगे आये हैं । इस ब्रांडिंग के बाद भी अगर देश के किसान आत्महत्या करें, तो इससे ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण कुछ नहीं हो सकता । फसल बर्बाद होने और सही दाम नहीं मिल पाने पे, जंतर मंतर या चक्का-जाम करके धरना प्रदर्शन करने का रिवाज़ जल्दी ही समाप्त हो जायेगा । अरे, भाई आप अपने किसमत और मेहनत की जिम्मेवारी कब तक सरकार पे थोपते रहेंगे ।  देखिये सलीम जी के बड़े लड़के को, इसी किसानी से हज़ारो कड़ोड़ कमा लिया, और आप सरकार पे ही अपना ठीकरा फोड़ रहे हैं, जैसे नौकरी न मिलने पे बेरोजगार युवा नौकरी न होने का बहाना बना रहा हो । समय रहते मेहनत करते तो आप भी सक्सेसफुल हो सकते थे, पर नहीं आपको बस एंटी होना है । खैर, सक्सेसफुल किसान होने के विषय पे जल्दी ही वेबिनार शुरू हो जायेगा। मुख्य-वक्ता एवं सफल किसान श्री सलमान भाई के श्रीमुख से सफल किसान होने के सौ मंत्र आपके रंगीन स्मार्टफोन के स्क्रीन पे प्रसारित होने लगेंगे । इसको देख के आगे से खेती-बाड़ी कीजिये, तब न टाइम्स नाउ और ज़ू...

लाखों कहानी का एक नायक : इरफ़ान

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इंसानी तौर पे हर शख्स दूसरों के यादों के कैनवास पे जीता है, और उसी पे मर जाता है । क्यूंकि स्मरण के क्षणो की जमापूंजी उसके साथ नहीं जाती । वो यहीं रहती है, अनगिनत आँखों में पेंशन फण्ड के तरह, जिसे कोई जरूरतमंद करीबी, अपने नास्टैल्जिया के पलों में डेबिट करता है । आखिरी आरामगाह तक के सफर को यादों के रंगीन फ्लैशबैक में, एक जिन्दा सपने के तरह देख, जिंदगी के ब्लैक-एंड-वाइट सच से खुद को रूबरू कराता है । संभावनाओं  के पंक्तियों पे पूर्ण-विराम लगा, कोई यादों की अलमारी ऐसे बंद करता है, जैसे फेसबुक पे अकाउंट डीएक्टिवेट कर रहा हो, पर जिंदगी उसे "मै वापस आऊंगा" के जिंदादिली के विकल्प से बेहतर कुछ नहीं देता ।   ऐसे ही "मै वापस आऊंगा" इरफ़ान के जिंदादिली में बोध होता है, जब वो अपने आखिरी फिल्म के प्रमोशन के आखिर में "वेट फॉर मी"  बोलते हैं । इंसानी तौर पे अब ये इंतज़ार प्रतिभा और हुनर के उस अनंत सुण्य की तरफ इशारा कर रहा है, जिसे वो पीछे छोड़ गएँ हैं । ये अनंत सुण्य हर उस कहानी को दर्शाता है, जिसे एक इंसान अपने पीछे छोड़ जाता है। जिंदगी का गिरता पर्दा, उस इंसान ...

पैसेंजर ट्रेन: प्रथम संस्करण

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यात्री 1- अरे, तनी बगल होइए, गेटबे पे खड़ा हो जाते हैं । यात्री 2- अंदर एतना भीड़ है, बुझाता नहीं है का ? यात्री 1- इतना भीड़ से प्रॉगलम है, त काहे नहीं चार-चकवा खरीद लेते हैं। यात्री 2- अरे, अपन काम करिये न महाराज, झूठो लेक्चर मत दीजिये, का करेंगे का नहीं उ तोरा से पूछ के करेंगे । यात्रीगण- अरे काहे मार कर रहे हैं, तनी बेलाग हट जाइये, उ अंदर आ जायेंगे ता खड़ा हो जाइएगा, आउ जेतना मन हो, पटना तक हावा खाते रहिएगा । यात्री 2- जाइये, जा के टेकरी नरेश के गद्दी पे बैठ जाइये, ऊहे बिना न शोभ रहें हैं । यात्री 1- बैठबे करेंगे, तोरा कोनो प्रॉग्लैम है? यात्रीगण- अजी जब उ जगह दे दिए, ता काहे मुहा-ठेठी कर रहे हैं,   आ के ओंट पकड़ के खड़ा हो जाइये । यात्री 3- अपन देह के भार, हमरा पे मत लादिए, ऐसे ही माथा ख़राब है, ऊपर से आप भी.....***. यात्री 1- इतना दिक्कत है, ता काहे ला ट्रैन से चलते हैं ? जेकरा देखो ओहे ऐंठ रहा है । जैसे सब टेकरी नरेश के बुतरू आजहे निकला है। यात्रीगण- अरे ऊपर सहरा के लिए पकड़ लीजिये सर, काहे नया लइकन से मुँह लगते हैं, आज के लइकन केकरो सुनता है । यात्री 1- हाँ, लेकिन ...

टिक-टॉक और दर्शक दीर्घा का नेपोटिस्म

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चीनी व्यवसाय में खरोच लगाने के दावों से बैन को ऐतिहासिक बताते-बताते, सैडिस्ट लोगो का एक जमात सोशल मीडिया पे टिक-टॉक स्टार्स के बेरोजगार हो जाने का जश्न मन रहा है । इसी जमात के लोग पिछले कुछ दिनों से बॉलीवुड में नेपोटिस्म पे चीख-चिल्ला रहें थे । मेरे समझ में इस जमात के लोग, वास्तविक समझ से परे सबसे बड़े घोंचू हैं । किसी के रोजगार छीन जाने से खुशी के एहसास में किसी पे व्यंग करना उचित नहीं है । टिक-टॉक का प्लेटफार्म पड़ोसी देश का था, परन्तु आप जिसके रोजगार जाने पे खुशी मना रहें हैं, वो शायद आपके पड़ोस में रहता था । आपके जैसे ही मिड्ल क्लास घर में बिना कैमरामैन, और लाइट के संसाधन के अपना फ़ोन ट्राइपौड पे फिक्स करके, अपने दोस्तों या परिजनों के साथ आपको मनोरंजन का एक क्लिप देता था । आज के तारीख में मनोरंजन की दुनिया संसाधन संपन्न लोगो के हाथों में सिमट गयी है, परन्तु प्रतिभा साधन संपन्न छत के नीचे ही जन्म ले, ऐसा जरूरी नहीं है । प्रतिभा साधन नहीं साध्य ढूंढती है । इस बड़े आबादी वाले देश में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है । हमारे जैसे बड़े आबादी वाले देश में प्रतिभा अवसर नामक बस-अड्डे पे जाता यात्री के...

फिर अपना क्या, गांव, शहर, देश?

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मध्यप्रदेश के गुना के बच्चों को पिता को गोद में ली हुई तस्वीर की कहानी मुझे ओमप्रकाश वाल्मीकि की कविता "ठाकुर का कुआँ" की पंक्तियों तक बार-बार पंहुचा दे रहीं हैं । वाल्मीकि इस कविता में भले जाती व्यवस्था से उपजे उत्पीड़न की बात कर रहे हैं, परन्तु चिंतन के सौवें भाग में, बारम्बार बच्चों के चीख से एक ही सवाल कानो तक आ रही है; "अपना क्या- गांव, शहर, देश?" ओमप्रकाश वाल्मीकि उत्तरप्रदेश से आने वाले बेहतरीन साहित्यकारों में से एक रहें हैं । दलित साहित्य के विकास में वाल्मीकि की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। "ठाकुर का कुआँ" वाल्मीकि के श्रेस्ठतम रचनाओं की सूचि में शुमार है । वाल्मीकि इस कविता में संसाधनों पे जातिगत एकाधिकार को बताते हुए, हाशिये के लोगों के सवाल पूछते हैं । मामूली लोगों के मूलभूत सवाल । ये कविता सन 1981 की है, पर कविता के सवाल मामूली बदलाव के साथ आज भी जीवित हैं । गुना में जेसीबी भले खड़ी फसल पे चलायी गयी हो, परन्तु पुलिस की लाठी से बरसती बर्बरता, भारत के संवैधानिक चेतना को उजाड़ रही थी । वर्दी के ठसक में लाठी बरसाते कानून के ये पहरेदार संविधान के पहली प...

"लिंचिंग एवं भारतीय अफवाह सभ्यता"

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महाराष्ट्र कोरोना से सर्वाधिक प्रवाभित राज्यों में से एक है, और वहां से हर रोज कुछ जिंदगी हारने की खबर आ रही है  ।  इन खबरों के बीच एक खबर महाराष्ट्र के पालघर जिले से आता है, जहाँ कुछ उन्मादियों के जमात ने तीन लोग को चोरी की आशंका से ग्रसित होकर मार-मार कर अधमरा कर देता है, और अस्पताल ले जाने के क्रम में उनकी मृत्यु हो जाती है । "द हिन्दू" अख़बार ने अपने रिपोर्ट में बताया है की सोशल मीडिया पे लॉक-डाउन में चोरी और डकैती के आशंका के सन्दर्भ में खासा अफवाह फैला हुआ था, जिसके कारन गांव के लोग रोड पे विगत कुछ दिनों से पहरा दे रहे थे  ।  इन्ही पहरेदारों की नज़र इन लोगो के गाड़ी पे पड़ती है, और फिर ये पहरेदार इस घटना को अंजाम तक पंहुचा देते हैं  ।   अब इस घटना जो आपको जिस रंग और परिपेक्ष में समझना हैं समझें, परन्तु मेरी राय में इस घटना के तीन मुख्य आरोपी हैं, एक वो जिन्होंने इस घटना को प्रत्यक्ष रूप से अंजाम तक पहुंचाया, दूसरे वो जिन्होंने ऐसी अफवाहें को फैला कर ऐसी घटना को तूल दे रहें थे, और तीसरा वहाँ की कानून व्यवस्था, जो ऐसी अफवाह के नजर में आने के वावजू...

"खिड़की से बाहर कूदते पन्ने"

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उसके बिस्तर के सामानांतर मेज पे, कुछ किताबें, एक लैपटॉप, सादे पन्नो पे अधूरे लफ्ज़ और जानने वालों के कॉन्टैक्ट नंबर सत्यापित करने की कोशिस पे यदा-कदा चहक उठने वाला फ़ोन, सिरहाने सोतें है । क्या वो सच में सोते होंगे, समझने के उलझन में बिस्तर पे लेट, चिंतन की मुद्रा में कई बार सो जाता । कभी-कभी अंधेरी रातों में किताबों के खुले पन्ने, पाठक के आस में पेपर-वेट के सहारे सुबह कर देतीं, तो कभी लैपटॉप अपने हुजूर-इ-मालिक के नींद से नाराज, डेढ़ घंटे बाद सोने चला जाता । किसी के कॉन्टैक्ट लिस्ट सत्यापित नहीं किये जाने पे, सुबह साढ़े-पांच के दैनिक अलार्म पे शोर मचता फ़ोन, दायीं ओर ऊँगली फेरने पे ऐसे चुप हो जाता है, मानो इसी स्पर्श को रात भर बेताब रहा हो । कभी पन्ने पे लिखा अधूरा लफ्ज़ सुबह नए अर्थ पाता, तो कभी अर्थ के अवसाद से ग्रसित होकर पन्ने खिड़की से बाहर कूद जाते । मेज़ के सामानांतर बिस्तर पे सोता व्यक्ति, मेज़ पे रखे वस्तुओं को देख उनमे जीवन तलाशता, तो कभी किसी के कांटेक्ट लिस्ट सत्यापित न करने के अवसाद में, खिड़की से नीचे गिरे पन्नो के खोये अर्थ से खुद को जोड़, अवसाद से दूर रहने की सलाह खुद को देता । उम...